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Showing posts from January, 2019

वैदिक कृषि विज्ञान

#प्राचीन_भारत_में_कृषि_विज्ञान: विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में कृषि का गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है। अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमान:। ऋग्वेद- ३४-१३ अर्थात् जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ। कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि:। (कृषि पाराशर-श्लोक-८) अर्थात् कृषि सम्पत्ति और मेधा प्रदान करती है और कृषि ही मानव जीवन का आधार है। वैदिक काल में ही बीजवपन, कटाई आदि क्रियाएं, हल, हंसिया, चलनी आदि उपकरण तथा गेहूं, धान, जौ आदि अनेक धान्यों का उत्पादन होता था। चक्रीय परती के द्वारा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की परम्परा के निर्माण का श्रेय उस समय के कृषकों को जाता है। यूरोपीय वनस्पति विज्ञान के जनक रोम्सबर्ग के अनुसार इस पद्धति को पश्चिम ने बाद के दिनों में अपनाया। कौटिल्य अर्थशास्त्र में मौर्य राजाओं के काल में कृषि, कृषि उत्पादन आदि को बढ़ावा देने हेतु कृषि अधिकारी की नियुक्ति का वर्णन मिलता है। कृषि हेतु सिंचाई की व्यवस्था विकसित की गई। यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने लिखा है कि मुख्य नाले और उसकी शाखाओं में जल के समान वितरण को निश्चित

प्राचीन अस्त्र विज्ञान

 "दिव्यास्त्र"  एक विस्मृतप्राय विज्ञान ________________________________________ इतिहास का तो प्रयोजन ही यही है, कि वो हमें वर्तमान निर्मित होने की कथा बताए कि हमारा आज जो है वौ कल कैसा था। इतिहास कहता है, "मानव जाति और अस्त्र शस्त्रों का बड़ा ही निकट संबंध रहा है।" "अस्त्र" अर्थात् फेंक कर प्रहार किए जाने वाले आयुध। और "शस्त्र" के मायने हाथ में लेकर ही प्रयोग किये जाने वाले आयुधों से है। प्रागैतिहासिक मानव ने अस्त्र शस्त्र का प्रयोग "एज़ ऐन ऑब्स्टेकल" किया है। शिकार की गति रोकने हेतु, शक्ति क्षीण करने हेतु। विकास का क्रम देखें तो पहले "शस्त्र" आये होंगे। किन्तु जल्दी ही मनुष्यो ने ये जान लिया कि शिकार के निकट जाना उचित नहीं, आवश्यक नहीं। अतः इस प्रेरणा से "अस्त्र" बने। पाषाण युग कब का बीत गया, कुछ "शांतिप्रिय" जन आज भी "पत्थरबाज़ी" में रुचि लेते हैं। खैर, अब हम "दिव्यास्त्रों" की ओर चलते हैं। यों तो कोई भी अस्त्र-शस्त्र "दिव्यता" को प्राप्त कर सकता है। किंतु

आध्यात्मिक शिखर=सुमेरु

सुमेरु पर्वत _______________________________________ आज इतिहासकर महोदय को बताया जाए कि किसी भी पौराणिक तथ्य की वैज्ञानिक अन्वेषणा कैसे की जाती है। "सत्य कड़वा होता है।" - ये कहा था बुजुर्गों ने। किन्तु वर्तमान में इस पङ्क्ति का प्रयोग कुछ यूँ हो रहा है : "जो कड़वा, वही सत्य।" बीते सप्ताह से देख रहा हूँ, "विज्ञान" के नाम पर कुछ भी लिखा जा रहा। इस बात को यूँ भी कहूँ, कि ऐसा माना जा रहा है : "जो तर्क सनातन धर्म शास्त्र की बात को काट दे, वही विज्ञान है।" तो अब विज्ञान की परिभाषा धर्म पर आधारित रहेगी? इतिहासकार महोदय द्वार उछाली गयी एक पङ्क्ति यत्र तत्र बिखरी हुई है : "सुमेरु पर्वत की ऊंचाई चौरासी हज़ार योजन है। अर्थात् सत्तावन लाख किमी। ये कैसे संभव है, सनातनधर्मध्वजाधारियो।" इस पङ्क्ति और साथ में की जाने वाली टिप्पणियों से स्पष्ट था कि पङ्क्ति लिखने से पूर्व ही इतिहासकार महोदय ने अपनी विजय मान ली है। ये कोई छोटा सा विषय नहीं है, बल्कि इसमें कई परतें हैं। आज, हम इस विमर्श पर आ पहुंचे हैं। आइये, "सुमेरु" पर्वत की ऊंच

अर्जुन का धनुष

गांडीव धनुष _______________________________________ "यजुर्वेद" में यज्ञ का क्या महत्त्व है? वही महत्त्व है "युद्ध" का "धनुर्वेद" में। "यज्ञ" में आहुति, मानो "युद्ध" में बाण। आहुति देने वाले यंत्र को "श्रुवा" कहा गया है। और "युद्धयज्ञ" में "बाणों" की आहुति देने वाले यंत्र को "धनुष"! अतएव, "धनुष" ही क्षत्रियों का "श्रुवा" है। सृष्टि के इतिहास में, तीन धनुष सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। वे हैं : "पिनाक", "शार्ङ्ग" और "गांडीव"। "पिनाक" और "शार्ङ्ग" क्रमशः शिव और विष्णु के धनुष हैं। इनके विषय में फिर कभी। फिलहाल, "गांडीव" पर बात हो! ## "गांडीव" शब्द "गड्" धातु से बना है। इस शब्द की रूप सिद्धि अत्यंत जटिल है। शायद अब तक मेरे द्वारा पोस्ट की गयी सभी सिद्धियों में, सर्वाधिक जटिल! धातु "गड्" का अर्थ है, "रस का कोश"। "गण्ड" या "गाँठों" वाली फसल को "

प्याज लहसुन क्यों नहीं खाते साधक

आप जानते हैं प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते हैं ब्राह्मण?आपको हैरान कर देगी इसके पीछे की कहानी हम आपको बताएंगे आध्यात्मिक  और वैज्ञानिक कारण। सबसे पहले आध्यात्मिक कारणों की बात की जाए तो पुराणों में ऐसा कहा गया है कि समुंद्र मंथन के दौरान जब समुंद्र से अमृत के कलश को निकाला गया तो देवताओं को अमरत्व प्रदान करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु उन सभी में अमृत बांट रहे थे। उस समय राहु और केतु नाम के दो राक्षस अमर होने के लिए देवताओं के बीच में आकर बैठ गए। भगवान विष्णु ने गलती से राहु और केतु को भी अमृत पिला दिया। हालांकि, भगवान विष्णु को जैसे ही इस बात की भनक लगी उन्होंने बिना देर किए अपना सुदर्शन चक्र घुमाया और राक्षसों के सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन  तब तक काफी देर हो चुकी थी। अमृत की कुछ बूंदें इनके मुंह में चली गई थी। इस वजह से उन दोनों का सिर तो अमर हो गया, लेकिन धड़ नष्ट हो गया। इस दोनों पर विष्णु जी ने जब प्र’हार किया तो खू’न की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गईं थीं। पुराणों में कहा गया है कि जमीन पर गिरे उन्हीं खू’न से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई।  यही कारण है कि हम जब भी प्याज और

चाक्षुषोपनिषद

चाक्षुषी विद्या प्रयोग 〰〰🌼🌼〰〰 नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है। इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत शीघ्रता से ठीक होते हैं। सैंकड़ों साधकों ने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया है। सभी नेत्र रोगियों के लिए चाक्षुषोपनिषद् प्राचीन ऋषि मुनियों का अमूल्य उपहार है। इस गुप्त धन का स्वतंत्र रूप से उपयोग करके अपना कल्याण करें। शुभ तिथि के शुभ नक्षत्रवाले रविवार को इस उपनिषद् का पठन करना प्रारंभ करें। पुष्य नक्षत्र सहित रविवार हो तो वह रविवार कामनापूर्ति हेतु पठन करने के लिए सर्वोत्तम समझें। प्रत्येक दिन चाक्षुषोपनिषद् का कम से कम बारह बार पाठ करें। बारह रविवार (लगभग तीन महीने) पूर्ण होने तक यह पाठ करना होता है। रविवार के दिन भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए। प्रातःकाल उठें। स्नान आदि करके शुद्ध होवें। आँखें बन्द करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर भावना करें कि ‘मेरे सभी प्रकार के नेत्ररोग भी सूर्यदेव की कृपा से ठीक हो रहे हैं।’ लाल चन्दनमिश्रित जल ताँबे के पात्र में भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। संभव हो तो षोडशोपचार विधि से पूजा करें। श्रद्धा-भक्ति

वैदिकसँस्कृति मे वृक्ष

वृक्षों का देव स्वरूप एक दृष्टि... भारतीय संस्कृति में वृक्षों को काटना हिंसा है। इनमें देवात्मा होती है।  सनातन संस्कृति में वृक्षों की पूजा होती है । अभिषेक , दीपदान , सुत्रबंधन , अक्षत-रोली-चन्दन-पुष्पों आदि से पूजन  किया जाता है और परिक्रमा की जाती है। १ पीपल  योगिराज भगवान् श्री कृष्ण श्रीमद भगवत गीता जी में कहते हैं : " वृक्षेषु अश्वस्था: " अर्थात " वृक्षों में मैं पीपल हूँ" | पीपल विष्णु वृक्ष है | पीपल के नीचे श्राद्ध क्रिया, गायत्री जप, कथा, स्तोत्र आदि संपन्न किये जाते हैं | पीपल का पेड़ काटने या कटवाने से पितर दोष लगता है...  इसके साथ ही प्रेतात्माओ का शाप भी लगता है जो रात को पीपल पर निवास करती हैं... (इसीलिए रात्री के समय पीपल की पूजा नहीं होती ) सूर्योदय के बाद पीपल पर माता लक्ष्मी का निवास मन गया है... पीपल की पूजा बृहस्पति और शनि दोषों से मुक्ति के लिए भी की जाती है | २ बरगद वट शिव वृक्ष है | प्रलय के समय मुकुंद ने अक्षय वट पर विश्राम किया था | यह अक्षय वट प्रयाग में है | महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं सौभाग्य के वरदान के

यज्ञोपवीत का विज्ञान

जनेऊ क्यों पहनते हैं?    (साभार मानस अमृत) ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ ----------------- पार. गृ.सू. 2.2.11। जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे 'यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है। आओ जानते हैं जनेऊ के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व के साथ ही उसके स्वास्थ लाभ

एकलव्य का अँगूठा

महाभारत के  गुरु द्रोणाचार्य पर एक आरोप बिना तथ्यों के लगाकर उसे प्रचारित भी किया गया। वामपंथ और मूढजन द्वारा उन आरोपों का खंडन करती ये पोस्ट=== जो लोग तीरंदाजी का अभ्यास करते हैं , वे यह बात भलीभाँति जानते हैं कि  बाण चलाने में दाहिने हाथ के अँगूठे का उपयोग नहीं किया जाता । यदि अँगूठे और अँगुली की सहायता से  बाण पर पकड़ बनाकर छोड़ा जाये तो बाण कभी भी सही निशाने पर नहीं लगेगा । ये बात आप किसी तीरँदाजी करते व्यक्ति को या उसके चित्र कौ देखकर आसानी से जान सकते हैं। एक कथा के अनुसार द्रोणाचार्य ने एकलव्य से दाहिने हाथ का अँगूठा  दक्षिणा में माँगा था । इस कथानक को न समझने वाले और धनुर्विद्या से पूर्णतः अनभिज्ञ लोग  कहते हैं कि  द्रोणाचार्य ने एकलव्य के साथ ऐसा न किया होता तो वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर हो जाता । ऐसे मूढजन भारतीय संस्कारों और गुरु-शिष्य परम्परा की पवित्रता व महत्ता को नहीं जानते । गुरु द्रोणाचार्य ने जब यह देखा कि एकलव्य जिसने उन्हें अपना मानस गुरु बना रखा है और सही विधि को न जानकर धनुष बाण चला रहा है , जिस कारण वह श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं बन पायेगा  और गुरु का नाम ख

शास्त्रों के अनुसार गुरुत्वाकर्षण बल

#न्यूटन और #गुरुत्वाकर्षण: वेद और वैदिक आर्य ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम को समझाने के लिये पर्याप्त सूत्र हैं। परन्तु वेदों के इस “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” को आज  “न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law Of Gravitation ) के नाम से पढ़ाया जा रहा है,जबकि सत्य यह है कि न्यूटन के जन्म से भी पहले हमारे वेदों में इसका उल्लेख है और वेदों के बाद कालांतर में अन्य लगभग 8-15 आचार्यों ने  “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” का  स्पष्ट वर्णन ग्रंथों में किया  है इसलिए “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” का नाम “न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law Of Gravitation ) ना होकर “वेदों का गुरुत्वाकर्षण का नियम ( Veda's Law Of Gravitation ) होना चाहिए । अनेकों प्रमाण हैं कि हमारे ऋषियों ने जो बात पहले ही वेदों में कही थी उसके सामने ये Newton कितना ठहरते हैं। न्यूटन जी ने जो #गति_के_नियम बताए हैं वह भी #भास्कराचार्य_जी से कॉपी किये हुए हैं। प्रारम्भ वेद से करते हैं और उसके बाद आचार्यों का वर्णन करते हैं: 1● ऋग्वेद में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का वर्णन :- ▶ यदा ते हर्य्यता हरी वावृधा

भारत का प्राणिशास्त्र

#भारतीय_ग्रंथों_में_प्राणी_विज्ञान - Zoology in Ancient Indian Scriptures: ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ भारतीय परम्परा के अनुसार सृष्टि में जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ है। इसकी अभिव्यक्ति अनेक ग्रंथों में हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन आता है- सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्तया वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्। तैस्तैर अतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय व्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥ (११-९-२८ श्रीमद्भागवतपुराण) विश्व की मूलभूत शक्ति सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त हुई। इस क्रम में वृक्ष, सरीसृप, पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़े, मत्स्य आदि अनेक रूपों में सृजन हुआ। परन्तु उससे उस चेतना को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हुई, अत: मनुष्य का निर्माण हुआ जो उस मूल तत्व का साक्षात्कार कर सकता था। दूसरी बात, भारतीय परम्परा में जीवन के प्रारंभ से मानव तक की यात्रा में ८४ लाख योनियों के बारे में कहा गया। आज से हजारों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने यह साक्षात्कार किया, यह आश्चर्यजनक है। अनेक आचार्यों ने इन ८४ लाख योनियों का वर्गीकरण किया है। समस्त प्राणियों को दो भागों में बांटा गया है, योनिज तथा आयोन

वाणी का स्वरूप

*वाणी का स्वरूप* वेदों में ट ठ ड ण क्यों नही लिखा गया सृष्टि की उत्पत्ति की प्रक्रिया नाद के साथ हुई। जब प्रथम महास्फोट (बिग बैंग) हुआ, तब आदि नाद उत्पन्न हुआ। उस मूल ध्वनि को जिसका प्रतीक ‘ॐ‘ है, नादव्रह्म कहा जाता है। पांतजलि योगसूत्र में पातंजलि मुनि ने इसका वर्णन ‘तस्य वाचक प्रणव:‘ की अभिव्यक्ति ॐ के रूप में है, ऐसा कहा है। माण्डूक्योपनिषद्‌ में कहा है- ओमित्येतदक्षरमिदम्‌ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिपि सर्वमोड्‌◌ंकार एवं यच्यान्यत्‌ त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥ माण्डूक्योपनिषद्‌-१॥ अर्थात्‌ ॐ अक्षर अविनाशी स्वरूप है। यह संम्पूर्ण जगत का ही उपव्याख्यान है। जो हो चुका है, जो है तथा जो होने वाला है, यह सबका सब जगत ओंकार ही है तथा जो ऊपर कहे हुए तीनों कालों से अतीत अन्य तत्व है, वह भी ओंकार ही है। वाणी का स्वरूप हमारे यहां वाणी विज्ञान का बहुत गहराई से विचार किया गया। ऋग्वेद में एक ऋचा आती है- चत्वारि वाक्‌ परिमिता पदानि तानि विदुर्व्राह्मणा ये मनीषिण: गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ ऋग्वेद १-१६४-४५ अर्थात्‌ वाणी के चार पाद ह

प्राचीन वैज्ञानिक देश भारत

प्राचीन भारत अतिशयोक्ति का भंडार या षड्यंत्र का शिकार ?  पढ़िये चीनी प्रोफेसर का अद्भुत विश्लेषण !......Pak L. Huide जो देश अपने इतिहास पर गर्व नहीं कर सकता वह कभी तरक्की नहीं कर सकता। चीनी मूल के कनाडा में रहने वाले टोरंटो विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पाक एल ह्यूडी (Pak L. Huide) का यही मानना है। तभी तो उन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में कहा है कि भारतीय प्राचीन इतिहास को कमतर आंका गया है, शायद भारत के प्राचीन इतिहास का सही से मूल्यांकन नहीं किया गया है। इस अर्थ में कहें तो भारत के पुराने इतिहासकार आत्मग्लानि बोध से ग्रसित दिखते हैं। भारत के प्राचीन इतिहास पर ह्यूडी ने दो विस्तृत शोधपरक आलेख लिखे हैं। पहले आलेख में उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास के योगदान का जिक्र किया था! उस पर आई असंख्य प्रतिक्रियाएं से प्रेरित होकर उन्होंने दूसरा आलेख लिखा है। अपने इस आलेख में उन्होंने भारतीय प्राचीन इतिहास का विश्लेषण किया है। उन्होंने अपने आलेख की शुरुआत प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में एक सवाल उठाते हुए किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘क्या प्राचीन भारत अतिरंजित ( बढ़ा चढ़ा क

विद्युतबैटरी का आविष्कार भारत मे

महर्षि अगस्त्य की उत्पत्ति रहस्य । रामायण में वर्णित अलंकारिक कथा में वसिष्ठ- अगस्त्य की उत्पत्ति मित्रावरुणके वीर्य को घड़े में संचित करने से हुई है । वास्तव में यह एक वैज्ञानिक विधा है ,जिसे गुप्त रखने के लिये इस तरह अलंकारिक रूपक बनाकर लिखा गया है । वास्तव में यह रहस्य है ,विद्युतके उत्पादन का । आप यह तो जानते ही होंगे ,विद्युतके दो रूप हैं । एक अप्रकट रूप जो आकाश में और तारों में विद्यमान रहता है । दूसरा है प्रकट रूप जो अम्बरके संयोग होने पर , और बल्व के स्विच ऑन करने पर बल्व के माध्यम से दृष्टिगोचर होता है । अप्रकट तड़ित तो विद्यमान है ही ,लेकिन प्रकट रूप के लिये एक विधा विशेष की आवश्यकता होती है । अन्यथा आकाशमें अम्बर के संयोग होने पर तड़ित दृष्टिगोचर होगी ,उसे मनुष्य अपने उपयोग में नहीं ला सकेगा । आपने कथा सुनी मित्र - वरुण ने अपना वीर्य घड़े में संचित किया ,जिससे अगस्त्य वसिष्ठ-अगस्त्य ऋषि की उत्पत्ति हुई । मित्र सूर्य का नाम है और वरुण जल का । सूर्य और जल से ही ऊर्जा उत्पन्न की जाती है । (सूर्य से उत्पन्न सौलर लाइट है जो सूर्य की ऊर्जा से उत्पन्न की जाती है । जल से उत्पन्न बि