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Showing posts from 2018

प्राण का वैज्ञानिक स्वरूप

शरीर में प्राण का प्रवाह ******************************************** विज्ञानवेत्ताओं ने इस संसार में ऐसी शक्ति का अस्तित्व पाया है जो पदार्थों की हलचल करने के लिए और प्राणियों को सोचने के लिये विवश करती है। कहा गया है कि यही वह मूल प्रेरक शक्ति है जिससे निःचेष्ट को सचेष्ट और निस्तब्ध की सक्रिय होने की सामर्थ्य मिलती है। वस्तुएं शक्तियां और प्राणियों की विविध विधि हलचलें इसी के प्रभाव से सम्भव हो रही हैं। समस्त अज्ञात और विज्ञात क्षेत्र के मूल में यही तत्व गतिशील है और अपनी गति से सब को अग्रगामी बनाता है। वैज्ञानिकों की दृष्टि में इसी जड़ चेतन स्तरों की समन्वित क्षमता का नाम प्राण होना चाहिये। पदार्थ को ही सब कुछ मानने वाले ग्रैविटी, ईथर, मैगनेट के रूप में उसकी व्याख्या करते हैं अथवा इन्हीं की उच्च स्तरीय स्थिति उसे बताते हैं। चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व मानने वाले वैज्ञानिक इसे ‘साईकिक कोर्स लेटेन्ट हीट’ कहते हैं और भारतीय मनीषी उसे प्राणत्व कहते हैं। इस सन्दर्भ में भारतीय तत्व दर्शन का मत रहा है कि प्राण द्वारा ही शरीर का अस्तित्व बसा रहता है। उसी के द्वारा शरीर का पोषण, पुनर

शेषनाग पर टिकी पृथ्वी का रहस्य

#हमारी_पृथ्वी_शेषनाग_के_फन_पर_टिकी_हुई_है... ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● हम सनातन हिन्दूधर्मी बचपन से ही एक बात सुनते आ रहे हैं कि.... हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है... और, जब वो (शेषनाग) थोड़ा सा हिलते है... तो, भूकंप आता है..! और, अंग्रेजी स्कूलों के पढ़े... तथा, हर चीज को वैज्ञानिक नजरिये से देखने वाले आज के बच्चे.... हमारे धर्मग्रंथ की इस बात को हँसी में उड़ा देते हैं... एवं, वामपंथियों और मलेच्छों के प्रभाव में आकर इसका मजाक उड़ाते हैं..! दरअसल, हमारी "पृथ्वी और शेषनाग वाली बात" महाभारत में इस प्रकार उल्लेखित है... "अधॊ महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम; स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति। इमां धरां धारयता त्वया हि मे; महत् परियं शेषकृतं भविष्यति।।" (महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक ) इसमें ही वर्णन मिलता है कि... शेषनाग को ब्रह्मा जी धरती को धारण करने को कहते हैं... और, क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लेते हैं. लेकिन इसमे लिखा है कि... शेषनाग को.... हमारी पृथ्वी को... धरत

भारत के प्राचीन ऋषि और उनके आविष्कार

_________________________ हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार  |  असाधारण या यूं कहें कि प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे – 💥महर्षि दधीचि - महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरु बनाकर काम चलाना पड़ा, किंतु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इंद्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था। उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इंद्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने

सनातनधर्म की अवधारणाएं

सनातन ........ विश्व का महान और प्राचीनतम धर्म जिसे हिँदू धर्म के रूप मे जाना जाति है। भारतीयसँविधान के अनुसार हिँदू एक विचारधारा है। जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा की देन है।  सभी विचारधाराओं का सम्मान करना  जरूरी है, क्योंकि धर्म का किसी तरह की विचारधारा से संबंध नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ ‘ब्रह्म ज्ञान’ से संबंध है।  ब्रह्म ज्ञान अनुसार प्राणीमात्र सत्य है। सत्य का अर्थ ‘यह भी’ और ‘वह भी’ दोनों ही सत्य है। *सत् और तत् मिलकर बना है सत्य।* यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जो व्यक्ति जिस भी धर्म में जन्मा है, वह उसी धर्म को सबसे प्राचीन और महान मानेगा। सत्य को जानने का प्रयास कम ही लोग करते हैं। हजारों वर्ष की लंबी परंपरा के कारण हिन्दू धर्म में कई तरह के भ्रम फैल गए हैं।  इन भ्रमों के चलते सनातन हिन्दू धर्म पर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं।  हम आपको बताएंगे कि वे कौन से भ्रम हैं और आखिर उनमें कितनी सचाई है।  ऐसे ही 16 तरह के भ्रमों की जानकारी को जानना जरूरी है। *हिन्दू धर्म के खिलाफ फैला भ्रम :* हिन्दू धर्म के बारे में हजारों तरह के भ्रम हिन्दुओं और गैर-हिन्दुओं म

ब्रह्मा--ईश्वर

ब्रह्मा - #परब्रह्मा १. #सृष्टि_पूर्व -ऋग्वेद के नासदीय सूक्त के अनुसार (१०/१२९/१ व २ ) - "न सदासीन्नो सदासीत्तादानी। न सीद्र्जो नो व्योमा परोयत। एवं --"आनंदी सूत स्वधया तदेकं। तस्माद्वायन्न पर किन्चनासि।" अर्थात #प्रारंभ में न #सत् था, न #असत, न परम व्योम व व्योम से परे लोकादि; सिर्फ वह एक अकेला ही स्वयं की शक्ति से, गति शून्य होकर स्थित था इस के अतिरिक्त कुछ नहीं था। कौन, कहाँ था कोइ नहीं जानता क्योंकि -- "अंग वेद यदि वा न वेद " वेद भी नहीं जानता क्योंकि तब ज्ञान भी नहीं था। तथा --""अशब्दम स्पर्शमरूपंव्ययम् ,तथा रसं नित्यं गन्धवच्च यत ""-(कठोपनिषद १/३/१५ )--अर्थात वह परब्रह्म अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, नित्य व अनादि है । भार रहित, स्वयम्भू, कारणों का कारण, कारण ब्रह्म है। उसे ऋषियों ने आत्मानुभूति से जाना व वेदों में गाया।( यह विज्ञान के एकात्मकता पिंड के समकक्ष है जो प्रयोगात्मक अनुमान प्रमाण से जाना गया है।) २. #परब्रह्म का भाव संकल्प - उसने अहेतुकी सृष्टि -प्रवृत्ति से, सृष्टि हित भाव संकल्प किया तब 'ॐ' के रूप में

कैलाश-भारत का आध्यात्मिक रहस्य

कैलाश पर्वत की तलहटी में एक दिन होता है ‘एक माह’ के बराबर *कैलाश की दिव्यता खोजियों को ऐसे आकर्षित करती रही है, जैसे खगोलविद आकाशगंगाओं की दमकती आभा को देखकर सम्मोहित हो जाते हैं। शताब्दियों से मौन खड़ा कैलाश संसार के पर्वतारोहियों और खोजियों को चुनौती दे रहा है लेकिन ‘महादेव के घर’ को देखना तो दूर, कोई उसकी तलहटी में जाकर खड़ा भी नहीं हो पाता। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट पर झंडा लहरा चुका मानव कैलाश पर्वत पर आरोहण क्यों नहीं कर सका? अनुभव बताते हैं कि कैलाश की तलहटी में पहुँचते ही आयु बहुत तेज़ी से बढ़ने लगती है।* *कैलाश पर्वत की सुंदरता, वहां सर्वत्र व्याप्त अदृश्य आध्यात्मिक तरंगों ने संसार में सबसे अधिक रूसियों को प्रभावित किया है। साल के बारह महीने रुसी खोजियों के कैम्प कैलाश पर्वत क्षेत्र में लगे रहते हैं। यहाँ की प्रचंड आध्यात्मिक अनुभूतियों के रहस्य का पता लगाने के लिए वे जान का जोखिम तक उठा लेते हैं।* *इन लोगों के अनुभव बता रहे हैं कि कैलाश पर्वत की तलहटी में ‘एजिंग’ बहुत तेज़ी से होने लगती है। भयानक अनुभवों से गुजरकर आए उन लोगों ने बताया कि वहां बिताया एक दिन ‘ए

कागज का आविष्कार

कागज कागज बनाना पूरी दुनिया को भारत ने सिखाया | कागज बनाना सबसे पहले भारत मे शुरू हुआ | हमारे भारत मे एक घास होती है उसको सन कहते है और एक घास होती है उसको मुंज कहती है | मुंज घास बहुत तीखी होती है ऊँगली को काट सकती है और खून निकाल सकती है | सन वाली घास थोड़ी नरम होती है ऊँगली को काटती नही है | भारत के हर गाँव मे फ़ोकट मे ये घास होती है | पूर्वी भारत और मध्य भारत मे हर गाँव मे होती है, बंगाल मे, बिहार मे, झाड़खंड मे, ओड़िसा मे, असम मे कोई गाँव नही जहाँ सन न हो और मुंज न हो | तो जिन इलाके मे सन और मुंज सबसे जादा होती रही है इसी इलाके मे सबसे पहले कागज बनना शुरू हुआ | वो सन की घास से और मुंज की घास से हमने सबसे पहले कागज बनाया | सबसे पहले कागज बनाके हमने दुनिया को दिया | और वो कागज बनाने की तकनीक आज से २००० साल पुराणी है | चीन के दस्ताबेजों से ये बात पता चली है | चीनिओं के दस्ताबेजों मे ये लिखा हुआ है के उन्होंने जो कागज बनाना सिखा वो भारत से सीखा, सन और मुंज की रस्सी से | कागज बनाने की भारतीय विधि : http://www.youtube.com/watch?v=WsupN4PIprY कागज निर्माता सन के पौधों से बने

सँस्कृत मै छिपा सँपूर्ण विज्ञान

सँस्कृत के श्लोको मे छिपे विश्व के अनमोल दुर्लभ ज्ञान से दूर होता भारतवर्ष। कई वर्ष पहले संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में थोपे जाने के केस में सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय पढ़ रहा था। जो अरुणा राय बनाम भारत संघ नामक वाद में दिया गया था। निर्णय अपनी जगह परंतु जो वाद दाखिल हुआ था , उसका वाद कारण बड़ा रोचक था ! याचिका कर्ता , अन्य कारण के अतिरिक्त माध्यमिक शिक्षा के केन्द्रीय बोर्ड में संस्कृत को वैकल्पिक विषय बनाया जाने से पीड़ित था ! याचिकाकर्ता का तर्क था कि संस्कृत थोपी जा रही हैं। यद्यपि संस्कृत वैकल्पिक विषय के रुप में शामिल किया गया था। परंतु फिर याचिकाकर्ता इसे थोपना मानता था ! माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के तर्को को ठुकरा दिया था ! और माननीय न्यायाधीशों ने ध्यान दिलाया कि संस्कृत भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल एक भाषा है ! प्राचीन भारतीय ज्ञान इसी भाषा में है। -------------------------------------- देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है ..जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं ,परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि .. संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूज

भारतीय छँदपरँपरा पर एक विस्तृत आलेख

छँद हमारी आत्मा से निसृत होने वाली सँगीतमयी रचना जो देवताओं को स्वर्ग से धरती पर आने को मजबूर कर दिया करती थी,,गँगाजैसी विराट नदियों को मानवरूप मे प्रकट कर देती थी।ये चमत्कार एक सहज मानवश्रम का ही प्रतिफल थी। “ये भारत की आत्मा थी पर यही इस देश का दुर्भाग्य रहा कि हम अपने ही ज्ञान को भूल गए क्योंकि उसे अब कोई पढाता ही नहीं और हमारे ही देश का युवा sine थीटा पढ़ कर कहता है, अरे ! ये तो पश्चिमी विज्ञान की देन है | जबकि ऐसा नहीं है | ये सारा ज्ञान हमारे ही देश से गया हुआ है | हमारा देश विश्व ज्ञान का केंद्र था और यहीं से  विद्या और विज्ञान का विश्व स्तर पर प्रसार हुआ करता था | पर आज वही सब बातें हम पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था के हिसाब से सीख रहे हैं, इसलिए उसे भ्रमवश पश्चिमी ही समझते हैं | हमारे ही देश के  बच्चों को अपनी ही जड़ों से दूर किया जा रहा है | उनके दिमाग को खोखला किया जा रहा है | उनको रिसर्च से, वेदों से, शास्त्रों से दूर किया जा रहा है और उनके दिमाग में भरा जा रहा है कि पश्चिम विज्ञान बड़ा उन्नत है |” -, ये बहुत प्रारंभिक स्तर की बातें हैं | सोचो, यदि ये बातें आजकल के बच्चो को