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Showing posts from October, 2018

सँस्कृत मै छिपा सँपूर्ण विज्ञान

सँस्कृत के श्लोको मे छिपे विश्व के अनमोल दुर्लभ ज्ञान से दूर होता भारतवर्ष। कई वर्ष पहले संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में थोपे जाने के केस में सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय पढ़ रहा था। जो अरुणा राय बनाम भारत संघ नामक वाद में दिया गया था। निर्णय अपनी जगह परंतु जो वाद दाखिल हुआ था , उसका वाद कारण बड़ा रोचक था ! याचिका कर्ता , अन्य कारण के अतिरिक्त माध्यमिक शिक्षा के केन्द्रीय बोर्ड में संस्कृत को वैकल्पिक विषय बनाया जाने से पीड़ित था ! याचिकाकर्ता का तर्क था कि संस्कृत थोपी जा रही हैं। यद्यपि संस्कृत वैकल्पिक विषय के रुप में शामिल किया गया था। परंतु फिर याचिकाकर्ता इसे थोपना मानता था ! माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के तर्को को ठुकरा दिया था ! और माननीय न्यायाधीशों ने ध्यान दिलाया कि संस्कृत भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल एक भाषा है ! प्राचीन भारतीय ज्ञान इसी भाषा में है। -------------------------------------- देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है ..जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं ,परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि .. संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूज

भारतीय छँदपरँपरा पर एक विस्तृत आलेख

छँद हमारी आत्मा से निसृत होने वाली सँगीतमयी रचना जो देवताओं को स्वर्ग से धरती पर आने को मजबूर कर दिया करती थी,,गँगाजैसी विराट नदियों को मानवरूप मे प्रकट कर देती थी।ये चमत्कार एक सहज मानवश्रम का ही प्रतिफल थी। “ये भारत की आत्मा थी पर यही इस देश का दुर्भाग्य रहा कि हम अपने ही ज्ञान को भूल गए क्योंकि उसे अब कोई पढाता ही नहीं और हमारे ही देश का युवा sine थीटा पढ़ कर कहता है, अरे ! ये तो पश्चिमी विज्ञान की देन है | जबकि ऐसा नहीं है | ये सारा ज्ञान हमारे ही देश से गया हुआ है | हमारा देश विश्व ज्ञान का केंद्र था और यहीं से  विद्या और विज्ञान का विश्व स्तर पर प्रसार हुआ करता था | पर आज वही सब बातें हम पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था के हिसाब से सीख रहे हैं, इसलिए उसे भ्रमवश पश्चिमी ही समझते हैं | हमारे ही देश के  बच्चों को अपनी ही जड़ों से दूर किया जा रहा है | उनके दिमाग को खोखला किया जा रहा है | उनको रिसर्च से, वेदों से, शास्त्रों से दूर किया जा रहा है और उनके दिमाग में भरा जा रहा है कि पश्चिम विज्ञान बड़ा उन्नत है |” -, ये बहुत प्रारंभिक स्तर की बातें हैं | सोचो, यदि ये बातें आजकल के बच्चो को

भारत के प्राचीन परमाणु शोध पर एक आलेख

*प्राचीन भारत में हुए परमाण्विक युद्ध !!* आधुनिक परमाणु बम का सफल परिक्षण 16 जुलाई 1945 को "न्यू मेक्सिको" के एक दूर दराज स्थान में किया गया। इस बम का निर्माण अमेरिका के एक वैज्ञानिक 'जूलियस रोबर्ट औपेन हाइमर' के नेतृत्व में किया गया। इन्हें परमाणु बम का जनक भी कहा जाता है। *इस एटम बम का नाम उन्होंने त्रिदेव ( ट्रिनिटी ) रखा।* *{त्रिदेव (ट्रिनीटी) नाम क्यो ?* परमाणु विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया में २३५ भार वाला यूरेनियम परमाणु,बेरियम और क्रिप्टन तत्वों में विघटित होता है। प्रति परमाणु ३ न्यूट्रान मुक्त होकर अन्य तीन परमाणुओं का विखण्डन करते है। कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिणित हो जाता है। आइंस्टाइन के सूत्र ऊर्जा = द्रव्यमान (प्रकाश का वेग)२ {E=MC^2} के अनुसार अपरिमित ऊर्जा अर्थात ऊष्मा व प्रकाश उत्पन्न होते है। १८९३ में जब स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में थे,उन्होने वेद और गीता के कतिपय श्लोकों का अंग्रेजी अनुवाद किया था। यद्यपि परमाणु बम विस्फोटक कमेटी के अध्यक्ष ओपेन हाइमर का जन्म स्वामी जी की मृत्यु के बाद हुआ था किन्तु राबर्ट ने श्लोकों का अध्ययन क

भारतीय गणित का सँक्षिप्त विवेचन

भारत की प्राचीन गणित दुनिया को शून्य, पाई, त्रिकोणमिति, नक्षत्र-शास्त्र, खगोल शास्त्र और ऐसे ही ना जाने कितने अनसुलझे रहस्यों की समझ देने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट्ट से कितने ही वर्षों पूर्व से भारत मे गणित के द्वारा ब्रह्मांड को जानने का अनुसँधान कार्यरत था।कोपरनिकस और गैलीलियो से सैंकड़ों वर्ष पहले हमारे देश में ऐसे गणितज्ञ और वैज्ञानिक हुए जिन्होंने पृथ्वी से चंद्र की दूरी, पृथ्वी की परिधि, सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के कारण आदि विषयों पर खोज की और सारे विश्व को यह तकनीक आज से 1500 वर्ष पहले ही दे दी थी । आर्यभट्‍ट का जन्म सन् 476 में भारत के कुसुमपुरा (पाटलिपुत्र) वर्तमान पटना नामक स्थान में हुआ था। आर्यभट्‍ट प्राचीन भारत के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे.. उनके कार्य आज भी विद्वानों को प्रेरणा देते हैं। वह उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने बीजगणित (एलजेबरा) का प्रयोग किया.. उन्होंने 'आर्यभटिया' नामक गणित की पुस्तक को कविता के रूप में लिखा, यह उस समय की बहुचर्चित पुस्तक है। इस पुस्तक का अधिकतम कार्य खगोलशास्त्र और गोलीय त्रिकोणमिति से संबंध रखता है। इस पुस्तक म

विश्व की प्राचीनतम लिपि-ब्राह्मी

सिंधु लिपि ------------------------------महान_इतिहासकार_जोजफ_आर्नल्ड_ट्वानबी_ने_कहा_था_विश्व_के_इतिहास_में_अगर_किसी_देश_के_इतिहास_के_साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है. भारतीय इतिहास का प्रारंभ सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है. बताया जाता है कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी. मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे. पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, पूरा पाकिस्तान व अफगानिस्तान तथा ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है. अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है. इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है. इतिहासकारों का दावा है कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है और पढ़ी नहीं जा सकी. जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे - इजिप्ट, चीनी

भारत,एक सोने की चिडिय़ा, समग्र

भारत का स्वर्णिम अतीत (सोने की चिड़िया) "सारी दुनिया में जो कुल उत्पादन होता है उसका 43% उत्पादन अकेले भारत में होता है और दुनिया के बाकी 200 देशों में मिलाकर 57% उत्पादन होता है।" इसके बाद अँग्रेजी संसद में एक और आंकड़ा प्रस्तुत किया गया की: "सारी दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा लगभग 33% है।" इसी तरह से एक और आंकड़ा भारत के बारे में अँग्रेजी संसद में दिया गया की: "सारी दुनिया की जो कुल आमदनी है, उस आमदनी का लगभग 27% हिस्सा अकेले भारत का है।" ये आंकड़ा अंग्रेजों द्वारा उनकी संसद में 1835 में और 1840 में भी दिया गया। आज से लगभग 100-150 साल से शुरू करके पिछले हज़ार साल का इतिहास के कुछ तथ्य। भारत के इतिहास/ अतीत पर दुनिया भर के 200 से ज्यादा विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञों ने बहुत शोध किया है। ये सारे विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञ भारत से बाहर के हैं,कुछ अंग्रेज़ हैं,कुछ स्कॉटिश हैं,कुछ अमेरिकन हैं,कुछ फ्रेंच हैं,कुछ जर्मन हैं। ऐसे दुनिया के अलग अलग देशों के विद्वानों/ इतिहास विशेषज्ञों ने भारत के बारे में जो कुछ कहा और लिखा है उसकी जानकारी 1. सब

भारत--- एक दृष्टि अतीत और वर्तमान के सँदर्भ मे

सनातन धर्म और आधुनिक भौतिकवाद । बड़ा आश्चर्य है धर्म को समझे बिना ही कथित नास्तिक धर्म पर प्रहार करने लगते हैं , कि 'धर्म ने विज्ञानके द्वारा भौतिक उत्कर्ष नहीं होने दिया और सदियों तक राष्ट्रको गुलाम रखा ।' धर्म को केवल मन्दिर जाकर घण्टा बजाना और अगरवत्ती लगाना समझ रखा है ,तभी ऐसी दुरागृहपूर्ण बातें करते हैं । धर्म के चार चरण धर्म अर्थ काम मोक्ष हैं जो बिना अर्थ और काम के सम्भव ही नहीं ,यही वैदिक भौतिकवाद है , हमारे धर्मज्ञ ऋषियों ने तो यन्त्रविज्ञानका विरोध किया है और न ही भौतिकवादका ही । लङ्का तक सेतु बनाने में भी श्रीरामकी सेना ने बड़े बड़े पत्थरों को ले जाने के लिये यन्त्रोंका ही सहारा लिया था -"पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रै: परिवहन्ति च ।"(युद्ध०२२/६०)       ऋषियोंने धर्म पालनके लिये अर्थ को आवश्यक बताया है -"तस्मात्पूर्वमुपादेयं वित्तमेव गृहैषिणा ।"(भविष्य०ब्रह्म०६/६) और अर्थके बिना समस्त धर्म कार्य निषेध किये गए हैं --"तद्वदर्थविहीनां सर्वत्र नाधिकारिता ।"(भविष्य०ब्रह्म०६/१३)    फिर भी दुराग्रह पूर्वक यह कहना कि धर्मज्ञ मनीषी यन्त्रविज्ञान

सामवेद मे ओजोनपरत का वर्णन

सामवेद में ऒजोन परत का विवरण हमारी धरती का वातावरण ,धरती के चारों और एक गिलाफ (आवरण) की तरह चढ़ा हुआ है जो सबसे नीचे धरती की सतह से ,१० कि.मी तक टोपोस्फीअर, १० से ५० किमी तक स्ट्रेटोस्फीअर व ऊपर आयेनो स्फीअर कहलाता है| स्ट्रेटो स्फीअर में ओजोन गैस की सतह होती है जो धरती का एक तरह से सुरक्षा कवच है और सूर्य की घातक अल्ट्रा -वायलेट किरणों से हमारी रक्षा करता है । इसी को धरती की ओजोन छतरी कहा जाता है। ओजोन गैस(O ३) , प्राण-वायु आक्सीजन का (O २ ) का एक अपर-रूप है जो सारी प्रथ्वी का लगभग ९३% ओजोन सतह में पाई जाती है एवं स्वयं शरीर के लिए आक्सीजन की तरह लाभकारी नहीं है। यह गैस स्ट्रेटो स्फीअर में उपस्थित ऑक्सीजन के सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों की क्रिया से बनती है ---O2 -+-अ -वा किरणें = 0+0 ;0 + 02 =03- -, यह एक अस्थिर गैस है, इस प्रकार , ओजोन-आक्सीजन चक्र बना रहता है। अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिए घातक होतीं है , ये सन-बर्न , मोतिया-बिन्दु, त्वचा के रोग व केंसर तथा आनुवंसिक हानियाँ पहुचातीं हैं। नाइट्रस आक्साइड ,क्लोराइड-ब्रोमाइड आदि ओर्गानो-हेलोजन ,जो मुख्यतः री फ्रिरेटर ,ऐ सी

मानवशरीर का आध्यात्मिक विश्लेषण

सात शरीर :: सनातन अवधारणा और भौतिक जीवन =================================== मानव शरीर एक कम्प्यूटर के समान ही रहस्यपूर्ण यन्त्र है ,इसे ठीक से समझने के लिए मानव के विभिन्न आयामों को समझना आवश्यक है |बाहरी रूप से जो शरीर हमें दिखाई देता है वास्तव में वह शरीर का केवल दस प्रतिशत भाग होता है |विद्वानों ने शरीर के सात स्तरों की बात की है - १- स्थूल शरीर [फिजिकल बाडी] २- आकाश शरीर [ईथरिक बाडी] ३- सूक्ष्म शरीर [एस्ट्रल बाडी] ४- मनस शरीर [ मेंटल बाडी] ५- आत्म शरीर [स्पिरिचुअल बाडी] ६- ब्रह्म शरीर [कास्मिक बाडी] और ७- निर्वाण शरीर [बाडिलेस बाडी] सनातन सिद्धांत और सोच के अनुसार मनस शास्त्रियों का कहना है की व्यक्तियों के जीवन में यह सातों स्तर उत्तरोत्तर विकसित होते हैं |सामान्य जन इसे नहीं समझ पाते ,यहाँ तक की साधक और कुंडलिनी के जानकार भी इसे व्यावहारिक स्तर पर न देखते हुए मात्र साधना से ही इनकी प्राप्ति और समझने की बात करते हैं |व्यावहारिक दृष्टिकोण की बात करें तो मनस शास्त्रियों के अनुसार सामान्य योग व्यवहार में रहते हुए एक शरीर का विकास लगभग सात वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए और लगभग ५० व