::::::::::::::::::स्वर विज्ञान ::::::::::::::::::: =========================== पृथ्वी पर पाए जाने वाले लगभग सभी जीवमात्र ,यहाँ तक की वनस्पति के लिए जीवन का आधार नाक से ली जाने वाली प्राणवायु है |सभी जीव विभिन्न प्रकार से इस जीवनदायी वायु को ग्रहण करते हैं ,इसी से उनमे जीवन की समस्त क्रियाओ और ऊर्जा उत्पादन होता है ,,इसका ग्रहण करना बंद होने पर जीव मृत हो जाता है |जल बिना तो जीवन कुछ दिनों तक संभव है किन्तु श्वांस बिना मिनटों भी संभव नहीं है |वायु को जीवमात्र द्वारा नासिका द्वारा ग्रहण किया जाता है |इसके ग्रहण करने की प्रकृति का बहुत बड़ा महत्व है |किस प्रकार किस ओर से वायु ग्रहण हो रही है इसका जीव पर गंभीर प्रभाव पड़ता है |विशिष्ट प्रकार से ग्रहण ही प्राणायाम का आधार है ,कुंडलिनी की ऊर्जा का स्रोत है |योग में इसे मूर्धन्य स्थान प्राप्त है |इसकी इन सब विशेषताओं को जानना ही स्वर विज्ञान है | स्वर विज्ञान को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है। स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद...
#न्यूटन और #गुरुत्वाकर्षण: वेद और वैदिक आर्य ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम को समझाने के लिये पर्याप्त सूत्र हैं। परन्तु वेदों के इस “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” को आज “न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law Of Gravitation ) के नाम से पढ़ाया जा रहा है,जबकि सत्य यह है कि न्यूटन के जन्म से भी पहले हमारे वेदों में इसका उल्लेख है और वेदों के बाद कालांतर में अन्य लगभग 8-15 आचार्यों ने “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” का स्पष्ट वर्णन ग्रंथों में किया है इसलिए “गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त” का नाम “न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law Of Gravitation ) ना होकर “वेदों का गुरुत्वाकर्षण का नियम ( Veda's Law Of Gravitation ) होना चाहिए । अनेकों प्रमाण हैं कि हमारे ऋषियों ने जो बात पहले ही वेदों में कही थी उसके सामने ये Newton कितना ठहरते हैं। न्यूटन जी ने जो #गति_के_नियम बताए हैं वह भी #भास्कराचार्य_जी से कॉपी किये हुए हैं। प्रारम्भ वेद से करते हैं और उसके बाद आचार्यों का वर्णन करते हैं: 1● ऋग्वेद में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का वर्णन :- ▶ यदा ते हर्य्यता हरी...
#हमारी_पृथ्वी_शेषनाग_के_फन_पर_टिकी_हुई_है... ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● हम सनातन हिन्दूधर्मी बचपन से ही एक बात सुनते आ रहे हैं कि.... हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है... और, जब वो (शेषनाग) थोड़ा सा हिलते है... तो, भूकंप आता है..! और, अंग्रेजी स्कूलों के पढ़े... तथा, हर चीज को वैज्ञानिक नजरिये से देखने वाले आज के बच्चे.... हमारे धर्मग्रंथ की इस बात को हँसी में उड़ा देते हैं... एवं, वामपंथियों और मलेच्छों के प्रभाव में आकर इसका मजाक उड़ाते हैं..! दरअसल, हमारी "पृथ्वी और शेषनाग वाली बात" महाभारत में इस प्रकार उल्लेखित है... "अधॊ महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम; स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति। इमां धरां धारयता त्वया हि मे; महत् परियं शेषकृतं भविष्यति।।" (महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक ) इसमें ही वर्णन मिलता है कि... शेषनाग को ब्रह्मा जी धरती को धारण करने को कहते हैं... और, क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लेते हैं. लेकिन इसमे लिखा है कि... शेषनाग को.... हमारी पृथ्वी को... धरत...
राधे राधे
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