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धर्म

धर्म (Dharma) =  आत्मा भारत की what is dharma :- किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते है जैसे अग्नि का धर्म उसकी गर्मी और तेज है। गर्मी और तेज के बिना अग्नि की कोई सत्ता नहीं। अत: मनुष्य का स्वाभाविक गुण मानवता है। यही उसका धर्म है। कुरान कहती है – मुस्लिम बनो। बाइबिल कहती है – ईसाई बनो। किन्तु वेद कहता है – मनुर्भव अर्थात मनुष्य बन जावो (ऋग्वेद 10-53-6)। अत: वेद (Ved) मानवधर्म का नियम शास्त्र है। जब भी कोई समाज, सभा या यंत्र आदि बनाया जाता है तो उसके सही संचालन के लिए नियम पूर्व ही निर्धारित कर दिये जाते है परमात्मा (God) ने सृष्टि के आरंभ में ही मानव कल्याण के लिए वेदों के माध्यम से इस अद्भुत रचना सृष्टि के सही संचालन व सदुपयोग के लिए दिव्य ज्ञान प्रदान किया। अत: यह कहना गलत है कि वेद केवल आर्यों (हिंदुओं) के लिए है, उन पर जितना हक हिंदुओं का है उतना ही मुस्लिमों का भी है। मानवता का संदेश देने वाले वैदिक धर्म (vedic religion) के अलावा दूसरे अन्य धर्म किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाये गए। धर्म चलते समय उन्होने अपने को ईश्वर का दूत व ईश्वर पुत्र बताया, ताकि ल...

वैदिक कृषि विज्ञान

#प्राचीन_भारत_में_कृषि_विज्ञान: विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में कृषि का गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है। अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमान:। ऋग्वेद- ३४-१३ अर्थात् जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ। कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि:। (कृषि पाराशर-श्लोक-८) अर्थात् कृषि सम्पत्ति और मेधा प्रदान करती है और कृषि ही मानव जीवन का आधार है। वैदिक काल में ही बीजवपन, कटाई आदि क्रियाएं, हल, हंसिया, चलनी आदि उपकरण तथा गेहूं, धान, जौ आदि अनेक धान्यों का उत्पादन होता था। चक्रीय परती के द्वारा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की परम्परा के निर्माण का श्रेय उस समय के कृषकों को जाता है। यूरोपीय वनस्पति विज्ञान के जनक रोम्सबर्ग के अनुसार इस पद्धति को पश्चिम ने बाद के दिनों में अपनाया। कौटिल्य अर्थशास्त्र में मौर्य राजाओं के काल में कृषि, कृषि उत्पादन आदि को बढ़ावा देने हेतु कृषि अधिकारी की नियुक्ति का वर्णन मिलता है। कृषि हेतु सिंचाई की व्यवस्था विकसित की गई। यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने लिखा है कि मुख्य नाले और उसकी शाखाओं में जल के समान वितरण को निश्चित...

प्राचीन अस्त्र विज्ञान

 "दिव्यास्त्र"  एक विस्मृतप्राय विज्ञान ________________________________________ इतिहास का तो प्रयोजन ही यही है, कि वो हमें वर्तमान निर्मित होने की कथा बताए कि हमारा आज जो है वौ कल कैसा था। इतिहास कहता है, "मानव जाति और अस्त्र शस्त्रों का बड़ा ही निकट संबंध रहा है।" "अस्त्र" अर्थात् फेंक कर प्रहार किए जाने वाले आयुध। और "शस्त्र" के मायने हाथ में लेकर ही प्रयोग किये जाने वाले आयुधों से है। प्रागैतिहासिक मानव ने अस्त्र शस्त्र का प्रयोग "एज़ ऐन ऑब्स्टेकल" किया है। शिकार की गति रोकने हेतु, शक्ति क्षीण करने हेतु। विकास का क्रम देखें तो पहले "शस्त्र" आये होंगे। किन्तु जल्दी ही मनुष्यो ने ये जान लिया कि शिकार के निकट जाना उचित नहीं, आवश्यक नहीं। अतः इस प्रेरणा से "अस्त्र" बने। पाषाण युग कब का बीत गया, कुछ "शांतिप्रिय" जन आज भी "पत्थरबाज़ी" में रुचि लेते हैं। खैर, अब हम "दिव्यास्त्रों" की ओर चलते हैं। यों तो कोई भी अस्त्र-शस्त्र "दिव्यता" को प्राप्त कर सकता है। किंतु...

आध्यात्मिक शिखर=सुमेरु

सुमेरु पर्वत _______________________________________ आज इतिहासकर महोदय को बताया जाए कि किसी भी पौराणिक तथ्य की वैज्ञानिक अन्वेषणा कैसे की जाती है। "सत्य कड़वा होता है।" - ये कहा था बुजुर्गों ने। किन्तु वर्तमान में इस पङ्क्ति का प्रयोग कुछ यूँ हो रहा है : "जो कड़वा, वही सत्य।" बीते सप्ताह से देख रहा हूँ, "विज्ञान" के नाम पर कुछ भी लिखा जा रहा। इस बात को यूँ भी कहूँ, कि ऐसा माना जा रहा है : "जो तर्क सनातन धर्म शास्त्र की बात को काट दे, वही विज्ञान है।" तो अब विज्ञान की परिभाषा धर्म पर आधारित रहेगी? इतिहासकार महोदय द्वार उछाली गयी एक पङ्क्ति यत्र तत्र बिखरी हुई है : "सुमेरु पर्वत की ऊंचाई चौरासी हज़ार योजन है। अर्थात् सत्तावन लाख किमी। ये कैसे संभव है, सनातनधर्मध्वजाधारियो।" इस पङ्क्ति और साथ में की जाने वाली टिप्पणियों से स्पष्ट था कि पङ्क्ति लिखने से पूर्व ही इतिहासकार महोदय ने अपनी विजय मान ली है। ये कोई छोटा सा विषय नहीं है, बल्कि इसमें कई परतें हैं। आज, हम इस विमर्श पर आ पहुंचे हैं। आइये, "सुमेरु" पर्वत की ऊंच...

अर्जुन का धनुष

गांडीव धनुष _______________________________________ "यजुर्वेद" में यज्ञ का क्या महत्त्व है? वही महत्त्व है "युद्ध" का "धनुर्वेद" में। "यज्ञ" में आहुति, मानो "युद्ध" में बाण। आहुति देने वाले यंत्र को "श्रुवा" कहा गया है। और "युद्धयज्ञ" में "बाणों" की आहुति देने वाले यंत्र को "धनुष"! अतएव, "धनुष" ही क्षत्रियों का "श्रुवा" है। सृष्टि के इतिहास में, तीन धनुष सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। वे हैं : "पिनाक", "शार्ङ्ग" और "गांडीव"। "पिनाक" और "शार्ङ्ग" क्रमशः शिव और विष्णु के धनुष हैं। इनके विषय में फिर कभी। फिलहाल, "गांडीव" पर बात हो! ## "गांडीव" शब्द "गड्" धातु से बना है। इस शब्द की रूप सिद्धि अत्यंत जटिल है। शायद अब तक मेरे द्वारा पोस्ट की गयी सभी सिद्धियों में, सर्वाधिक जटिल! धातु "गड्" का अर्थ है, "रस का कोश"। "गण्ड" या "गाँठों" वाली फसल को ...

प्याज लहसुन क्यों नहीं खाते साधक

आप जानते हैं प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते हैं ब्राह्मण?आपको हैरान कर देगी इसके पीछे की कहानी हम आपको बताएंगे आध्यात्मिक  और वैज्ञानिक कारण। सबसे पहले आध्यात्मिक कारणों की बात की जाए तो पुराणों में ऐसा कहा गया है कि समुंद्र मंथन के दौरान जब समुंद्र से अमृत के कलश को निकाला गया तो देवताओं को अमरत्व प्रदान करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु उन सभी में अमृत बांट रहे थे। उस समय राहु और केतु नाम के दो राक्षस अमर होने के लिए देवताओं के बीच में आकर बैठ गए। भगवान विष्णु ने गलती से राहु और केतु को भी अमृत पिला दिया। हालांकि, भगवान विष्णु को जैसे ही इस बात की भनक लगी उन्होंने बिना देर किए अपना सुदर्शन चक्र घुमाया और राक्षसों के सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन  तब तक काफी देर हो चुकी थी। अमृत की कुछ बूंदें इनके मुंह में चली गई थी। इस वजह से उन दोनों का सिर तो अमर हो गया, लेकिन धड़ नष्ट हो गया। इस दोनों पर विष्णु जी ने जब प्र’हार किया तो खू’न की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गईं थीं। पुराणों में कहा गया है कि जमीन पर गिरे उन्हीं खू’न से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई।  यही कारण है कि हम ...

चाक्षुषोपनिषद

चाक्षुषी विद्या प्रयोग 〰〰🌼🌼〰〰 नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है। इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत शीघ्रता से ठीक होते हैं। सैंकड़ों साधकों ने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया है। सभी नेत्र रोगियों के लिए चाक्षुषोपनिषद् प्राचीन ऋषि मुनियों का अमूल्य उपहार है। इस गुप्त धन का स्वतंत्र रूप से उपयोग करके अपना कल्याण करें। शुभ तिथि के शुभ नक्षत्रवाले रविवार को इस उपनिषद् का पठन करना प्रारंभ करें। पुष्य नक्षत्र सहित रविवार हो तो वह रविवार कामनापूर्ति हेतु पठन करने के लिए सर्वोत्तम समझें। प्रत्येक दिन चाक्षुषोपनिषद् का कम से कम बारह बार पाठ करें। बारह रविवार (लगभग तीन महीने) पूर्ण होने तक यह पाठ करना होता है। रविवार के दिन भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए। प्रातःकाल उठें। स्नान आदि करके शुद्ध होवें। आँखें बन्द करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर भावना करें कि ‘मेरे सभी प्रकार के नेत्ररोग भी सूर्यदेव की कृपा से ठीक हो रहे हैं।’ लाल चन्दनमिश्रित जल ताँबे के पात्र में भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। संभव हो तो षोडशोपचार विधि से पूजा करें। श्रद्धा-भक्ति...